Thursday, 1 January 2015

ज्ञान.............

एक बेचैन शख़्स ने पूछ दिया मुझसे कि ज्ञान क्या चीज़ है, मैंने कहा ज्ञान वो अमूल्य धन हैं जो इंसान को मानसिक शांति देता है और कठिन परिस्थितियों में भी मुस्कुराने की हिम्मत देता है।

फिर उसने पूछा कि ये ज्ञान कहाँ मिलता हैं मैंने तो पी.एच.डी की है, मैंने कहा ये ज्ञान डिग्री से हासिल नहीं होता, ये ज्ञान ज़िंदगी से हासिल करनी पड़ती है.

                                                                                      गजेन्द्र कुमार 

Tuesday, 30 December 2014

PK पर हंगामा क्यों ? ....

मुझे ताज़्जुब होता कि फिल्म  PK को लेकर लोग विरोध कर रहे हैं। मेरे Mphil में रिसर्च का विषय इसी विषय से सम्बंधित था। रिसर्च के आधार पर मैं ये दावे के साथ कह सकता हूँ कि फिल्म से सिर्फ कुछ संकीर्ण सोच वाले लोगों को या फिर कुछ छोटे-मोटे संगठनों को दिक्कत है। भारत के ज्यादातर लोगों को इससे कोई दिक्कत नहीं है वो फिल्म को एन्जॉय कर रहे हैं। उनके हिसाब से फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है जिस पर हंगामा खड़ा किया जाये। लोकतंत्र में क्या ये जायज है कि सिर्फ कुछ लोगों की सोच पुरे देश पर थोपा जाये। कुछ लोग इन मुद्दों पर अपनी राजनितिक रोटियां भी सेंकते है। अफ़सोस की सरकार भी इन छुटपुट लोगों के दवाब में आ जाती है और इनकी बातों को मान लिया जाता है, क्योंकि ये हंगामा मचाते हैं, तोड़-फोड़ करते हैं। बाकी ज्यादातर लोग चुप रहते हैं इस कारण सरकार उनकी  नहीं सुनती। विडम्बना ये है अब योग गुरु बाबा रामदेव भी इसमें कूद पड़े है वो अभिनेता आमिर खान की गिरफ़्तारी तक की मांग कर चुके हैं लेकिन अब काले धन पर चुप हैं। काला धन अब उनके लिए बड़ा मुद्दा नहीं रहा।
इस फिल्म में हिन्दू धर्म के विरोध में कुछ नहीं दिखाया गया है, हाँ हिन्दू धर्म में व्यापत बुराइयों पर ज़रूर प्रकाश डाला गया है, इससे तो किसी को कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। ऐसा करके वो इन बुराइयों को दूर करना चाहते हैं ताकि हिन्दू धर्म पहले से ज्यादा अच्छा हो। अगर हंगामा मचाना हीं है तो ये छुटपुट लोग बेरोज़गारी, महगाई, शोषण जैसे मुद्दे पर क्यों नहीं मचाते ? क्या धर्म बचाने से लोग सुखी हो जायेंगें या गरीबी दूर हो जाएगी ? ठण्ड से कितने गरीब लोगों की मौत हो रही वो इन छुटपुट लोगों को नहीं दीखता ? हमारे समाज को सच सुनने और देखने की आदत डाल लेनी चाहिए।

गजेन्द्र कुमार

Friday, 20 June 2014

बस यूँ हीं .....

हिंदी का भी कुछ हो सकता है क्या ?

सरकार द्वारा हिंदी को प्राथमिकता देने पर इतना हो-हल्ला तो नहीं मचना चाहिए था पर अफ़सोस ऐसा हो रहा है... अगर हिंदी की जगह इंग्लिश की बात की जाती तो शायद इतना हो हल्ला नहीं मचता...बड़ा अजीब है ना जब भी हिंदी की बात की जाती है लोग चिल्लाने लगते है, कहते हैं उनपर हिंदी ना थोपी जाये...पर हिंदी भाषी लोगों पर आज जो ज़बरदस्ती इंग्लिश थोपी जा रही है वो किसी को नहीं दिखता..ना हीं कोई हो-हल्ला मचाता है... आज-कल तो लोग हिंदी को समाप्त करने पर तुले हुए हैं..हिंदी की कोई पूछ नहीं रही और ना हीं इसकी कोई इज़्ज़त है... तभी तो हिंदी जानने वालों को कमतर आँका जाता है..वही इंग्लिश जानने वालों को सर पर बिठाया जाता है...यही कारण है कि आजकल हिंदी जानने वाले हीनभावना  से ग्रसित होते जा रहे हैं...शायद एक हिंदी जानने वाले के प्रधानमंत्री बनने से , हिंदी को फिर से जीवित करने कि कोशिश की जा रही है...शायद वो हिंदी भाषी लोगों का दर्द समझते हों इस कारण कुछ कर सके तो कोई आश्चर्य ना होगा...अगर सरकार वाकई राजनीति ना कर दिल से हिंदी के लिए कुछ करना चाहती है... तो हिंदी को रोज़गार देने वाली भाषा बनानी होगी तभी हिंदी का उद्धार हो सकता है....क्यों कि हिंदी जानने वालों को रोज़गार कम मिलता जब कि अंग्रेज़ी जानने वालों को रोज़गार आसानी से मिल जाती है और आजकल हर जगह इंग्लिश जानने वालों को पहले प्राथमिकता दी जाती है.....इसलिए सरकार को हिंदी को रोज़गार परक बनना होगा वरना ये बातें बस बातें हीं रह जाएगी...    

गजेन्द्र कुमार

Tuesday, 17 June 2014

बस यूँ हीं ...

उसकी गलती थी या बदकिस्मती ............

आवारा हवा की तरह था वो, बेपरवाह, बेफ़िक्र, मस्तमौला। कहां सुनता था किसी की वो, ना मम्मी­पापा की डांट का, ना भाई­बहन की नाराजगी का और ना हीं लोग की फटकार का असर पड़ता था। बस उसे जो अच्छा लगता था वही करता था। कुछ लोग उसे पागल भी कहते थे। और जहां तक मै उसे जानता था, ना वो पागल था, ना वो नादान था और ना हीं नासमझ था। वो तो बस वैसा ही था। लोगों  की परवाह किये बगैर अपनी मर्ज़ी का मालिक। मां­-बाप इसकी हरकतों से परेशान रहते थे। उसे शराब पीने की बुरी लत भी लग गई थी। गांव में रहता था वो, गावों में अक्सर शादी कम उम्र में हीं कर दी जाती है। मां­-बाप ने पढ़ाने की पूरी कोिशश की पर उसे पढ़ने में दिल कहां लगता था। मां­-बाप ने सोचा अब शादी कर दो शायद जिम्मेदारी का बोझ आ जाने पर कुछ सुधर जाए। शादी भी हो गई और बच्चे भी, पर उसमें कोई सुधार न हुआ। पर हां लगता है पत्नी की डांट ने थोड़ा ही सही पर उसे कुछ जिम्मेदार बना दिया था। उसे भी दो पैसे कमाने की चाह पैदा हुई और छोटा­-मोटा काम करना भी शुरु कर दिया  था। पर शराब पीने की लत उसकी गई नहीं थी। काम से छुट्टी लेकर वो घर आया हुआ था, शाम को बाइक से निकला और रात को शराब पीकर घर लौट रहा था। ऐसा वो पहली बार नहीं कर रहा था, ऐसा अक्सर वो किया करता था पर आज शायद उसकी किस्मत खराब थी। लौटते वक़्त रास्ते में एक ट्रैक्टर से टक्कर हो गई और इस दुर्घटना में उसका एक पैर बुरी तरह ज़ख़्मी हो गया। जिसे डाक्टर ने काटकर शरीर से अलग कर दिया। उसे अपना पैर गवांना पड़ा। वो अब अपाहिजों में गिना जाने लगा है। बहुत दुःख हुआ सुनकर उससे मिलना चाहता हूँ पर हिम्मत नहीं होती। हां उसके मा-बाप से फोन पर बात ज़रूर हुई। रो­ रोकर बुरा हाल है उनका। उसके पताजी की सिसकियाँ फोन पर ज़रूर सुनाई देर ही थी। वो भी अस्पताल में पड़े बेटे से मिलने की हिम्मत जुटा रहे थे। कह रहे थे उसे तो हिम्मत देने की ज़रुरत है और मेरा हिम्मत तो जवाब दे गया है, मै उसे हिम्मत कहाँ से दूंगा। उससे जो भी मिलने जाता उससे वह रोते हुए बस यही कहता है कि मेरी ज़िंदगी अब बर्बाद हो गई। मां­-बाप बस एक ही रट लगाये हुए हैं कि मेरे चांद में भी दाग लग गया। जैसे इन्हें अपने चांद जैसे बेटे पर बेदाग होने का बड़ा गुमान था। मेरा दिल भी पसीज गया उनसे बातें करके, आंखे भी नम हो गई थी, पर कोई क्या कर सकता था, सिवाय दिलासा देनेे के। कई लोग कहते है कि अगर शराब नहीं पी होती तो ऐसा नहीं होता पर कई लोग कहते हैं कि उसकी किस्मत खराब थी। ये कौन सा ऐसा पहली बार कर रहा था। बस आज किस्मत ने साथ छोड़ दी। दुर्घटना में मरने वाले सारे लोग शराबी तो नहीं होते है ना। ये उसकी  गलती थी या उसकी बदकिस्मती, इसका फैसला करना तो खैर मेरे वश की बात नहीं है। पर दुःख बहुत हुआ इसके बारे में ऐसा सुनकर एक पल के लिए तो मेरे होश ही उड़ गए थे। उसकी उम्र हीं अभी क्या है यही कोई २७-­28 साल का होगा वो, अब एक पैर के सहारे पूरी ज़िंदगी बितानी है।भगवान उसे हिम्मत दे।

                                                              गजेन्द्र कुमार 

Sunday, 13 April 2014

बस यूँ हीं ...

सुबह होती है, शाम होती है, उम्र यूं ही तमाम होती है....

                   मोबाइल का अलार्म सुबह-सुबह कोयल की आवाज़ में कूक उठता है। सुबह की नींद बड़ी प्यारी होती है। कोयल की कूक से नींद टूट तो जाती है पर आंखें नहीं खुलती और फिर अनमने ढंग से, आंखें बंद किए हुए, हाथ बरबस मोबाइल सेट की ओर बढ़ता है और फिर 5 मिनट और सो जाने की चाहत के साथ, कोयल को खामोश कर लेटा रहता हूं। कमरा छत पर होने की वजह से सुबह-सुबह की ठंडी हवा मेरे तन को स्पर्श करने लगती है। बड़ा अच्छा लगता है, आधी नींद में होने के कारण ठंडी हवा को अच्छी तरह महसूस भी करता हूं। जागने का जी नहीं करता पर थोड़ी देर बाद हीं सूरज की चंचल किरणों की रोशनी भी छत के मुंडेरों से टकराकर मेरी आंखों से शरारत करने लगते हैं और फिर मुझे जागना हीं पड़ता है। अंगड़ाईयां लेता हुआ बिस्तर से उठता हूं और जम्हाई लेते हुए डगमगाते कदमों से कमरे से बाहर आकर, ठंडी हवा के बीच तेज़ सांसें लेकर खुद को तरोताज़ा करता हूं। उसके बाद नहा-धोकर ऑफिस जाने की तैयारी करने लगता हूं। इस वक्त मुझे अपनी यूनिवर्सिटी के दोस्त मुझे बहुत याद आते हैं, क्योंकि यूनिवर्सिटी के अपने दोस्तों के ग्रुप में सुबह-सुबह सबसे पहले मैं हीं जागता था फिर दोस्तों के कमरे में जाकर उनकी नींद खराब करता था। उन्हें परेशान करके और गालियां देकर जगाता था और कभी-कभी तो मैं काफी गांलियां भी सुनता था। इस तरह उनकी तो आदत हीं बन गई थी की बिना मेरी गाली सुने उनकी नींद हीं नहीं खुलती थी। उसके बाद हमलोग इकठ्ठे ब्रेकफास्ट करने जाते थे। यहां ब्रैकफास्ट करते समय खानाऱूम (मैस) की शरारतें भी याद आती है, जब हम एक-दूसरे के प्लेट से पराठे और दहीं छीन कर खा जाते थे। खैर यादें तो याद करने के लिए हीं होती है।

                नास्ता करने के बाद ऑफिस जाने के लिए मैट्रो का रूख करता हूं। शुरूआत में मुझे मैट्रो से सफर करने में पता नहीं क्यों, थोड़ी घबराहट होती थी लेकिन अब ठीक है। मैट्रो की सफर के भीड़ का हिस्सा मैं भी बन चुका हूं। ऑफिस टाइम में तो इतनी भीड़ होती है कि मैट्रो में पैर रखने तक की जगह नहीं होती। फिर भी लोग बिना किसी परेशानी के सफर करते दिखते हैं। लोगों को आदत हो गई है या फिर यूं कहें की और कोई रास्ता भी तो नहीं है। खैर जो भी हो मैट्रो में मुझे तरह-तरह के लोग या फिल्मी स्टाइल में कहें तो किरदार देखने को मिल जाते हैं। उन किरदारों को मैं चुपचाप देखता हूं और एंज्वाय करने की कोशिश करता हूं तो कभी-कभी कुछ सीखने की भी कोशिश करता हूं। चुनावी महौल है इस कारण मैट्रो में भी केजरीवाल और मोदी के बारे में अक्सर लोगों के रोचक चर्चे सुनने को मिल जाते हैं।
  
            मैट्रो में कई बार नोक-झोंक भी देखने को मिल जाता है। मैने देखा है कि कैसे महिलाएं अपनी सीट के लिए पुरूषों से लड़ जाती है। अच्छा है महिलाएं अब जागरूक हो गई हैं, अपने हक के लिए लड़ना सीख गई हैं। पर मुझे बुरा तब लगा जब मैट्रो में एक वृद्ध वाली जगह पर एक लड़की बैठी थी और एक लगभग 70 साल का बूढ़ा कमज़ोर व्यक्ति उसके सामने खड़ा था लेकिन उसने सीट देने की ज़रा भी तकलीफ़ नहीं की। जबकि उस व्यक्ति की आंखे बार-बार उसकी ओर देख रही थी कि शायद लड़की अब कहेगी की आप बैठ जाओ अंकल, लेकिन ऐसा न हुआ। इस बात से ये साफ हो जाता है कि हम और आप हर कोई अपने हक और अधिकार के लिए तो लड़ना जानते हैं लेकिन हम अपना फ़र्ज और कर्त्तव्य नहीं निभाना चाहते।

                एक मजे की बात करता हूं। और वो ये है कि मैनें गौर किया है कि यहां दिल्ली में लोगों को एक दूसरे से प्यार हो या ना हो लेकिन दो जोड़ों (कपल) के बीच का प्यार साफ दिख जाता है। बाकी मुझे नहीं पता की ये वाकई रुह वाला प्यार है या नहीं, लेकिन उनकी हरकतों से बाहर वाला प्यार तो मैट्रो में दिख ही जाता है। इस मामले में भी दिल्ली ने काफी तरक्की कर ली है। अच्छा है लोगों को पूरी स्वतंत्रता का एहसास होता है, कोई कुछ भी करें, कहीं भी करें। कोई रोकता नहीं। इन चंचल शोख हसीनाओं को देखकर मेरे मासूम चेहरे के अंदर छुपा चंचल दिल भी मचल उठता है और बरबस नजरें बार-बार गुस्ताखी करने लगते हैं। तांक-झाक का सिलसिला कमबख्त मैं चाहकर भी नहीं रोक पाता। क्या करूं कभी-कभी काफी मज़बूर हो जाता हूं, इन मामलों में अपने आप को कंट्रोल नहीं कर पाता। मुझे थोड़ा बुरा तब लगा जब यहां मैने काफी कम उम्र वाले बच्चे जो अभी स्कूल में ही पढ़ते हैं। मैट्रो के अंदर ऐसी हरकत करते हैं, जिसे देखकर मेरी आंखें झुक गई। लेकिन उनकी हरकतें नहीं रुकी, पास में ही एक बूढ़े अंकल भी थे। चेहरे से ऐसा लग रहा था की वो आग बबूले हो रहे हैं पर उन्होनें कुछ नहीं कहा। मुझे नहीं पता ऐसी आजादी सही भी है या गलत। इसे आज़ादी कहें या कुछ और।

                        ये तो बात हो गई मैट्रो की। मैट्रो से सफर करने के बाद ऑफिस जाता हूं और फिर वापिस भी मैट्रो से हीं आता हूं। शाम को कमरे में थोड़ी देर आराम कर लेता हूं, थोड़ी देर लैपटाप के साथ टाइमपास कर लेता हूं। फिर रात के खाने के बाद। छत पर टहलते हुए मोबाइल से बातें करना शुरू करता हूं। आजकल मोबइल पर बातें थोड़ी ज्यादा होने लगी है। बातें करते हुए मैने एक बात गौर की है की रात को मोटी औरतें गली में या फिर छत पर ज्यादा टहलती दिखाई देती हैं, लेकिन एक भी मर्द नहीं दिखते। इसका ये मतलब बिल्कूल नहीं है कि मर्द मोटे है ही नहीं। इससे ये पता चलता है कि औरतें स्वास्थ्य को लेकर ज्यादा जागरुक हैं। इन मोटे लोगों को देखकर सबसे पहले मन में ये बात आती है की इनसे थोड़ा-बहुत मोटापा मुझमें आ जाता तो कितना अच्छा होता, पर ऐसा हो नहीं सकता। इसके बाद सो जाता हूं और फिर सुबह कोयल की कूक से नींद खुलती है। इस तरह सुबह होती, शाम होती और दिन गुजर जाता है।

                                                                                                               गजेन्द्र कुमार