Wednesday, 31 July 2013

बँटवारा....

बँटवारा एक ऐसा शब्द है जिससे आजतक किसी का हित नहीं हुआ है. अब तेलंगाना आन्ध्र प्रदेश से अलग  होकर एक नया राज्य बनने जा रहा है...लोगों का तर्क है कि छोटे राज्य बनने से राज्य का विकास ज्यादा होगा ...२००० में इसी तरह तीन नये राज्य बने थे झारखण्ड, उत्तराखंड तथा छत्तीसगढ़...इन राज्यों के बने हुए १३ साल हो गये और इनका कितना विकास हो गया ये हम सभी जानते हैं...अगर छोटा राज्य विकास का पैमाना होता तो फिर छोटे राज्य विकास में सबसे आगे होते पर ऐसा बिलकुल नहीं है... अगर छोटे राज्य या छोटे क्षेत्र होना ही विकास की गारंटी होती तो भारत के बंटवारे के बाद आज पाकिस्तान  विकास में हमसे काफी आगे होता, उसी तरह बांगलादेश को भी भारत से आगे होना चाहिए था और भारत को चीन से आगे होना चाहिए था पर क्या ऐसा है नहीं ना ...राज्य या देश का विकास अच्छे प्रशासन और अच्छी नीतियों से होता है ना की राज्यों को बांटकर छोटा करने से .. ये राजनेता अपने हित को देखकर नये राज्यों का निर्माण कर देते हैं... आकड़ों की बाजीगरी दिखाकर लोगों के सामने ऐसे आंकड़े पेश करतें हैं कि वाकई ऐसा लगता है की छोटे राज्य बनने से राज्य का विकास हो रहा पर क्या वाकई ये सच्चाई है, मुझे तो ऐसा बिलकुल नहीं लगता क्यूँकि लोगों को आज भी गरीबी, भुखमरी और बेरोज़गारी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है... आकड़ों की बाजीगरी ही है कि २८ रूपये कमाने वाले को सरकार गरीब नहीं मानती ...बंटवारे हमारे परिवार के बीच भी होतें है और बँटवारा बहुत दुखदायी होता है ..बँटवारा अपनों के बीच नफरत पैदा करती हैं, बटवारे के बाद हम स्वार्थी हो जाते हैं...हम दूसरों के बारे में सोचना बंद कर देते हैं... पाकिस्तान के बंटवारे ने लोगों को कितना दुःख दिया , इतनी नफरत पैदा की कि आज भी पाकिस्तान को हम अच्छी नज़र से नहीं देखते..शहरों में विकास तेज़ी के साथ हो रहा है यहाँ का परिवार भी काफी छोटा होता और लोगों का दूसरे लोगों के साथ कितना संपर्क होता है और ये लोग दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं ये हमें पता हैं....तेलंगाना राज्य की मंजूरी मिलने के बाद कई प्रदेशों में कई और नये राज्यों की मांग जोर पकड़ रही है... पश्चिम बंगाल से गोरखालैंड, महाराष्ट्र से विदर्भ, बिहार से मिथलांचल की माग हो रही है तथा उत्तरप्रदेश को चार राज्यों में बटने की मांग हो रही है...ऐसा नहीं था की सरकार को इस बात की आशंका नहीं थी पर सरकार को तो समय देखकर अपना हित ही देखना होता है ना...भुगतना तो आम आदमी को पड़ता है ...मैं तो बस इतना जनता हूँ कि बंटवारा किसी भी समस्यां का समाधान नहीं है...ये तो बस लोगों को भाषा, धर्म और जाती के नाम पर बंटा जा रहा है,, जो लोगों के बीच नफरत तथा वैर का बिष घोल रही है...
                                                                                                                        गजेन्द्र कुमार 

Monday, 29 July 2013

ये जो पब्लिक है सब जानती है ....

ये जो पब्लिक है सब जानती है ....

 इस बात से मैं भी इतेफाक रखता हूँ कि ये जो पब्लिक है सब जानती है... पब्लिक से कुछ भी छुपा नहीं है...जैसे की कल-परसों ग्रेटर नोएडा की एसडीएम और आईएएस अफसर दुर्गा शक्ति नागपाल को उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार ने सस्पेंड कर दिया था। इसके पीछे सरकार धार्मिक सौहार्द को ख़तरे में डालने की वजह बता रही थी। अब पब्लिक यानी जनता अच्छी तरह जानती है की आईएएस अफसर के कड़े कदमों से सौहार्द ख़तरे में था या फिर यू.पी सरकार को खतरा था... हर ईमानदार अफसर को ऐसे ही कुछ न कुछ वजह बताकर या फंसाकर सरकार बाहर का रास्ता दिखाती है... सरकार को ऐसे अफसर चाहिए जो सरकार की हाँ में हाँ मिलाये और जनता की सेवा न करके सरकार की सेवा करे. जनता सब जानती है की अफसर को हटाने की वजह क्या है.... पब्लिक को सरकार के प्रति नाराज़गी जताने की जगह पब्लिक तो खुश होकर कहती है कि मैं तो जानता हीं था एक न एक दिन तो ऐसा होना ही था...ऐसी पब्लिक कुछ जाने या न जाने क्या फर्क पड़ता है...पब्लिक सब जानती है की कॊन नेता भ्रष्ट है और कोन नहीं ..फिर भी मजाल है की ईमानदार व्यक्ति को वोट करेंगें .....नेतागिरी आजकल वयवसाय बन गया है, जितना ज्यादा इन्वेस्टमेंट उतना ज्यादा फायदे का सौदा है नेतागिरी ...नेता आजकल सेवा करने के लिए नहीं सेवा लेने के लिए बन रहे हैं... पब्लिक ये भी जानती है कि  नेता हमारे सेवा करने के लिए बनते हैं फिर भी पब्लिक उनकी सेवा में लगी होती हैं. और तो और ज्यादातर पढ़े-लिखे अफसर भी नेताओं की भक्ति में ही लीन रहते हैं...ना जाने कैसे ये पढ़े-लिखे अफसर भी भ्रष्ट और अनपढ़ नेताओं की चापलूसी करना पसंद करते हैं ???  ना जाने कैसे इनका ईमान और ज़मीर इसकी इज़ाज़त देता है ????  और जो नेताओं की भक्ति नहीं करते उनका क्या हश्र होता है ? ये  पब्लिक अच्छी तरह जानती है... बेचारे ये अफसर कब से पुलिस सुधार की मांग कर रहे हैं ताकि ये नेताओं के हाथ की कठपुतली ना बने पर इनकी सुनता कोन है ....नेताओं के सामने ये बेचारे नज़र आतें हैं पर पब्लिक के सामने आते ही यही शेर बन जाते हैं.....बड़ी अजीब विडंबना है....मीडिया वाले चिल्लाते रहतें हैं ..ये पब्लिक है सब जानती हैं ये जो पब्लिक है ....ऐसे मरे हुए पब्लिक के जानने ना जानने से क्या फर्क पड़ता है ....मीडिया जी अगर आप चाहो तो मरे हुए पब्लिक को भी जगा सकते हो ...पर आप तो बस चिल्लना जानते हो ना, क्यूँ की  टी. आर. पी(TRP) भी तो इसी से बढती है ना ...मीडिया जी आप भी ना बस कहने के लिए आज़ाद हो ...है ना ??? अगर मैं गलत कह रहा हूँ तो ये भी चिल्ला-चिल्लाकर कहना, क्यूँ कि ये जो पब्लिक है सब जानती है .....

                                                                                                                          गजेन्द्र कुमार 

Saturday, 27 July 2013

एक चिट्ठी माँ के नाम .......

मेरी प्यारी माँ ,
                   सादर प्रणाम .

                  माँ, यूँ तो तुम हमेशा याद आती हो पर कभी-कभी बहुत ज्यादा याद आती हो. खासकर तब, जब मैं यहाँ भूखा होता हूँ और कोई पूछने तक नहीं आता कि खाना खाया की नहीं और एक तुम हो जो की भूखे नहीं होने पर भी बार-बार खाने के लिए कहती थी. बार-बार खाने के लिए पूछने के कारण मैं झल्लाकर तुमपर गुस्सा हो जाता था फिर भी तुम नहीं मानती थी और खाना खिलाकर ही दम लेती थी. माँ कभी-कभी यहाँ का बेस्वाद खाना खाते वक़्त वो बातें याद आतीं है, जब घर होने पर मैं तुम्हारे साथ एक हीं थाली में खाना खाता था तो भाभी अक्सर कहती थी कि आप अब बच्चे नहीं रहे जो माँ के साथ एक ही थाली में खाओ. इतना कहतें ही हम दोनों हँस पड़ते थे और भाभी भी मुस्कुराते हुए वहीँ बैठकर मुझे छेडती और परेशान करने लगती.  बचपन खत्म होते ही पढाई को लेकर मैं हमेशा तुमसे दूर ही रहा. आपने भी यही सोचा होगा कि पढ़ाई खत्म होने के बाद मेरा बेटा मेरे पास रहकर नौकरी करेगा. सब कुछ इतना आसान कहाँ है माँ, नौकरी मिल भी जाये तो पता नहीं घर से कितना दूर होगा....पढाई और नौकरी रिश्तों के बीच दूरियां पैदा कर रही है. ज़िन्दगी के लिए दोनों ज़रूरी है पर क्या रिश्ते ज़रूरी नहीं हैं ??? रिश्तों के बिना ज़िन्दगी भी, क्या ज़िन्दगी है ??? माँ कभी-कभी ना इस सुनसान कमरे में अपने रिश्तेदारों की बहुत याद आती है, उस वक़्त बस खट्टी-मिट्ठी यादों के पिटारे से पुरानी बातें, छेड़खानियाँ, हँसी-ठिठोली याद कर मुस्कुरा लेता हूँ और सोचता हूँ ऐसा वक़्त कभी ना कभी फिर मिलेगा. बड़ा अच्छा लगता है पुरानी यादों को ताज़ा करने में पर माँ तुम बहुत याद आती हो, कभी कभी तो अकेले में रो भी लेता हूँ.

                    हरबार छुट्टी खत्म होने पर जब मैं घर से विदा होता हूँ तो दिल भारी हो जाता है. जब तुम विदा करते समय अपनी डबडबाई आखों के साथ मुझे गले लगाती हो और फिर मेरे चेहरे को चूमने के बाद हाथ हिलाकर विदा करती हो तो कलेजा फट सा जाता है. लगता है जैसे छोटे बच्चे की तरह तुमसे लिपटकर मुझे दूर न करने की ज़िद करूँ पर कम्बखत मैं ऐसा भी नहीं कर सकता. मुझे ये भी पता है माँ, तुम्हारी आँखों से बहते खामोश आसूँ ये चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे होतें हैं कि बेटा मुझे छोड़कर मत जा और फिर तुम दिल को समझा लेती हो कि बेटा कुछ बनने जा रहा है... कितना मुश्किल होता होगा वो पल माँ है ना.  तुम हमेशा कहती हो कि मेरी एक बेटी होती तो अच्छा होता पर बेटी ना होने के वाबजूद बेटी की विदाई जैसा पल बार-बार तुम्हें मिलता है... तुम महान हो माँ जो चुप-चाप हर बार दर्द को सह लेती हो. मुझे बड़ा दुःख होता है माँ , मैं बहुत शर्मिंदा हूँ माँ कि मैं आज भी आपके पास नहीं हूँ जबकि आपकी उम्र ढल रही है, आप अक्सर बीमार रहतीं है, इस वक़्त आपको मेरी बहुत ज़रूरत होती है और मैं यहाँ बैठकर मोबाइल से बस आपका हाल पूछता रहता हूँ..... तुम महान हो माँ, इतने कष्ट के वाबजूद मुझे रुकने के लिए नहीं कहती. ये सब सिर्फ मेरे लिए करती हैं ना आप, ताकि मेरी जिंदगी बन जाये पर माँ आप ही तो मेरी जिंदगी हो ...
                                                            जी करता है सबकुछ छोड़कर तुम्हारे पास आ जाऊ पर इससे भी तो तुम्हे दुःख हीं होगा और मेरा कमीना दिमाग भी इसकी इज़ाज़त नहीं देता पर कब तक इस कमीने दिमाग कि बात मानता रहूँ ,आखिर कब तक माँ ??? तुम बहुत भोली हो माँ जो तुम समझती हो कि मुझे नौकरी घर के पास ही मिल जाएगी और मैं तुम्हारे साथ रहूँगा. जहाँ तक मुझे दिखाई दे रहा है अभी साथ होने के कोई आसार नहीं है . मुझे माफ़ करना माँ, मैं तुमपर कई बार गुस्सा भी हो जाता हूँ जैसेकि इसबार घर से वापिस आने के वक़्त तुम मेरे लिए अपने हाथों से बने पकवान मेरे बैग में डाल रही थी और मैंने मना कर दिया कि मत डालो. फिर भी आपने डाल दिए और मैं आप पर गुस्सा हो गया. पता नहीं क्यूँ वापसी के वक़्त मेरा दिमाग कुछ गर्म हो जाता है.. आखिर वो पकवान किसके लिए दे रही थी, मेरे लिए ही ना , बाद में ट्रेन में मेरी भूख को शांत इसी पकवान ने ही किया. तब मुझे अपने आप पर अफ़सोस और आपके प्यार पर गर्व हो रहा था.
                                                                अभी भी मैं छुट्टी होने का इतज़ार करता रहता हूँ ताकि आपका लाड़-दुलार पा सकूँ. घर आने पर मेरी पसंद की चीजें बनाकर मुझे खिलाती हैं और आप कितना खुश होती हो, कितना सुकून होता है आपके चेहरे पर, यही तो माँ होती है, मैं आपको कभी खोना नहीं चाहता माँ... आपकी जगह कोई भी नहीं ले सकता माँ... मैं बहुत खुदगर्ज़ हूँ माँ, आपने मेरे लिए क्या कुछ नहीं किया पर मैं चाहकर भी आपके लिए कुछ नहीं कर सका...हो सके तो मुझे माफ़ करना ....मुझे पता है ये ख़त पापा आपको पढ़कर सुना रहे होंगें और उन्हें दुःख हो रहा होगा कि मेरे बारे में कुछ नहीं कहा.. पापा ये सारी बातें सिर्फ माँ के लिए नहीं है आपदोनों के लिए है ...वैसे भी माँ शब्द इतना प्यारा लगता है कि माँ कहना बड़ा अच्छा लगता है ...आपसे भी मैं उतना ही प्यार करता हूँ जितना माँ से ...वैसे नाराज़ मत होइएगा जल्दी ही मैं आपके नाम की भी चिट्ठी लिखूंगा ...
                                                                         
                                                                                                                आपका मज़बूर बेटा .....

   
                                                                                                                                          गजेन्द्र कुमार 

बस यूँ ही ...


 माफ़ करना आधुनिकता के इस ज़माने में मैं चिट्ठी को याद करने की गुस्ताखी कर रहा हूँ. एक तरफ जहाँ लोग चिट्ठी को भूल रहे हैं वही मुझे पता नहीं क्यूँ अब चिट्ठी लिखने का जी कर रहा है. मुझे याद है मैंने बचपन में कई चिट्ठियां अपने घर पर भेजी थी जब मैं घर से दूर हॉस्टल में रहा करता था और तब मेरे घर पर टेलीफोन नहीं हुआ करता था. मेरी चिट्ठी पढ़कर माँ की आँखें डबडबा जाती थी और पापा बड़े खुश होते थे की मेरा बेटा बहुत अच्छा लिखता है. चिट्ठी लिखने के लिए मैं सब दोस्तों को झूठ बोलकर अकेले होने का मौका ढूंढता था. हॉस्टल में अकेले होने का वक़्त कम ही मिल पाता था इसिलए मैं कभी-कभी दोस्तों से बहाना बनाता और शाम को जब वो खेलने जाते थे तब मैं चिट्ठियां लिखा करता था. देर-सबेर टेलीफोन ने मेरे घर में भी दस्तक दे ही दिया उसके बाद तो चिट्ठी से रिश्ता ऐसा टूटा की आज याद आया. टेलीफोन आने के बाद घर में टेलीफोन की घंटी बजती तो घर में दूर बैठा मैं दौड़कर टेलीफोन उठा लेता था. हालाँकि कोई भी फ़ोन मेरे लिए नहीं होता था फिर भी फ़ोन की घंटी बजने पर मैं दौड़कर फ़ोन उठा लेता था. फ़ोन ज्यादातर पापा के लिए होता था या फिर पड़ोसिओं के लिए, पड़ोसिओं को बुलाने का काम भी मैं ही करता था. टेलीफोन के प्रति बढ़ते लगाव से चिट्ठी  को बहुत दुःख हुआ होगा. धीरे-धीरे चिट्ठी का वर्चस्व कम होता गया पर चिट्ठी के इस बुरे दौर में भी प्रेम-पत्र काफी फल-फूल रहा था. मुझे याद है स्कूल के कई दोस्त कैसे अपने प्रेम-पत्र लिखवाने के लिए मुझसे गुज़ारिश करते थे. उस प्रेम पत्र में शेरो-शायरी की भरमार होती थी जो की मेरे पास पड़ी इक  शेरो-शायरी की डायरी से मेरे दोस्तों द्वारा चुनी जाती थी. प्रेम पत्र में किसी डाकिये की ज़रूरत नहीं होती थी. डाकिये का काम कोई दोस्त या लड़की की कोई नजदीकी करता/करती थी. प्रेम पत्र में प्रेमी अपनी पूरी भावना लिखता था बड़ी मेहनत से कोई प्रेम पत्र तैयार होता था. इतनी मेहनत के वाबजूद भी शायद ही कोई लड़की मानती थी पर आजकल तो फ़ोन और मेसेज से लड़कियां आसानी से मान जाती है. जबकि फ़ोन और मेसेज के ज़रिये हम अपनी भावनाओं को अच्छी तरह प्रकट नहीं कर सकते. एक बात तो साफ़ है कि जैसे-जैसे चिठ्ठी विलुप्त होती जा रही है, वैसे-वैसे हम भी भावन विहीन होते जा रहे हैं.


                                                                                                                                      गजेन्द्र कुमार

Wednesday, 8 May 2013

मज़बूरी का नाम कांग्रेस


कर्नाटक विधान सभा चुनाव का परिणाम आ चूका है। कांग्रेस पार्टी कर्नाटक में काफी लम्बे अरसे के बाद पूर्ण बहुमत  में आई है। निश्चित रूप से कांग्रेस पार्टी के लिए ख़ुशी मनाने का वक़्त है, पर देश की जनता के लिए सोचने का वक़्त है. कांग्रेस पार्टी की जीत कई सवाल खड़े करते हैं.. क्या जनता कांग्रेस पार्टी के नेताओं द्वारा किये जाने वाले घोटालों को भूल गयी है ? या फिर उन्हें घोटालों के बारे में पता ही नहीं है ? या फिर और दुसरे पार्टियों से कांग्रेस पार्टी ज्यादा ईमानदार है ? या फिर कोई और विकल्प ना होने पर मज़बूरी में कांग्रेस पार्टी ही सही ? मुझे तो यही लगता है, क्यों की कर्नाटक एक विकसित राज्य है वहां के ज्यादातर लोग शिक्षित हैं. कर्नाटक की जनता को 2G घोटाले, कोलगेट,रेल मंत्री जी का नया मामला, आदि ये सारी बातें दिमाग में ज़रूर होगी, पर करे भी तो क्या आज के दौर में कोन सी पार्टी है जो भ्रस्ट नहीं है ? ये हाल पुरे देश का है कोई भी ऐसी पार्टी नहीं है जो भ्रस्ट नहीं है ..
                                                    लोग बड़ी उम्मीद के साथ हर बार नयी पार्टी की सरकार बनाते है की अब शायद पार्टी कुछ अच्छा करेगी पर उम्मीद हर बार की तरह धूमिल हो जाती है। पार्टी की जीत के बाद पार्टी के लोग अपनी सेखी बधारने लगते हैं की मेरी पार्टी अच्छी है, ये जानते हुए की वो जनता के लिए क्या करते हैं। निश्चित रूप से ये कांग्रेस की जीत नहीं है। यह जनता की मज़बूरी है कि किसी न किसी पार्टी को तो वोट देना ही है चाहे वो भ्रस्ट ही क्यूँ न हो। और यह मजबूरी हमारे देश को बर्बादी की तरफ तेज़ी के साथ ले जा रही है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो एक दिन हमारा देश पूरी तरह खोखला हो जायेगा और लोग हम पर हसेंगें...क्या ऐसा होने से हम इसे रोक सकते हैं ???????????

Friday, 19 April 2013

हँसता मीडिया रोता पत्रकार ......


आज के दौर में मीडिया शब्द आम हो चूका है. आम लोग, सरकारी कर्मचारी या फिर नेता हर किसी के जुबान पर मीडिया होता है. सबसे ज्यादा मीडिया का शब्द नेताओं के जुबान पर होता है. आए दिन उनके जुबान पर यही वाक्य सुनाई देता है कि ये सारा कुछ मीडिया का किया कराया है, मीडिया ने इसे तोड़ मरोड़कर कर पेश किया है. एक क्षण ऐसा लगता है कि आज भी मीडिया समाज और देश के लिए बहुत अच्छा काम कर रहा है लेकिन अगले ही क्षण अहसास होता है कि मीडिया तो बिजनेस मेन और राजनेताओं कि कठपुतली बन चूका है. मीडिया वही खबर प्रकाशित या प्रसारित करता है जो बिजनेस मेन और नेता चाहते हैं. मीडिया अपनी जिम्मेदारी ताख पर रखकर वही चीज़ लोगों के सामने लाती है जो व्यापार की दृष्टि से सही हो. मीडिया की मज़बूरी यह है कि सारे मीडिया ओर्गेनिजेशेन के मालिक (ओनर ) या तो कोई नेता है या फिर कोई बिजनेस मेन है और दोनों एक दूसरों को नाराज़ नहीं करना चाहते, क्यूँकि साथ मिलकर चलने में ही दोनों का फायदा है. यही कारण है कि आज मीडिया कि विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो रहे हैं. लोगों का विश्वास मीडिया पर से उठता जा रहा है.
                                                    ज्यादातर छात्र एवं छात्राएं मीडिया के क्षेत्र में नाम और पैसे के  साथ-साथ समाज सेवा की भावन लिए हुए आते हैं पर कटु सत्य कुछ और हीं है. इस क्षेत्र में नाम और पैसे तो ज़रूर हैं पर कुछ एक लोगों के लिए, खासकर उनके लिए जो मीडिया के उच्च पदों पर विराजमान हैं. बाकि मीडियाकर्मियों का तो बुरा हाल है.मेरे कई होनहार दोस्त मीडिया से जुड़े हुए हैं. वे दो लोगों का काम अकेले करतें हैं, साथ ही इनसे 10 से 12 घंटे काम लिया जाता है पर वेतन के नाम पर उन्हें मात्र 10 या 12 हज़ार रुपयें मिलतें हैं. इनकी योग्यता भी कम नहीं है इन्होने पत्रकारिता में मास्टर डिग्री कर रखी है. ऐसी बात भी नहीं की इनमें दक्षता (स्किल) की कमी है या फिर प्रतिभा की कमी है. मौका मिलने पर ये उच्च पदों पर आसीन  लोगों से भी अच्छा काम कर सकतें हैं. अफ़सोस की बात तो ये है की मीडिया ओर्गेनैजेशन ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाने के चक्कर में इनके दक्षता और प्रतिभा को नज़रंदाज़ कर रहा है. बेरोज़गारी का आलम तो देखिये कुछ पत्रकार तो 5 हज़ार से 6 हज़ार पर भी काम कर रहे हैं. जबकि इनके पास उच्च शिक्षा वाली डिग्री है. कुछ पत्रकारों को तो यह कहा जाता है कि आप खबर पर कम ध्यान देकर विज्ञापन पर ज्यादा ध्यान दें और ज्यादा से ज्यादा विज्ञापन लायें. यानि अब पत्रकार भी मार्केटिंग का काम करने लगा है. अगर भूल से कोई पत्रकार महगाई का हवाला देकर पैसे बढ़ाने कि मांग करता है तो उनका सीधा सा जवाब होता है कि आप कुछ ज्यादा नहीं मांग रहे या फिर, तो कही और नौकरी ढूंढ़ लो.
                                           मीडिया ओर्गेनैजेशन के मालिक पैसों का ढेर इकठठा कर रहे हैं वही इसके कर्मचारी कम पैसे का रोना रोतें रहतें हैं पर इनकी सुनने वाला भी कोई नहीं है. आश्चर्य कि बात तो ये है कि जो मीडिया लोगों कि आवाज़ बुलंद करता है वही मीडिया अपनी आवाज़ नहीं उठा रहा है और लगातार शोषण का शिकार हो रहा है.आज के दौर में पत्रकार पैसे-पैसे के लिए मोहताज़ हो रहे हैं. यही कारण है कि देश का चौथा स्तम्भ कहा जाने वाला मीडिया आज झूठ और बेईमानी का स्तम्भ बनता जा रहा है जो कि एक लोकतान्त्रिक देश के लिए किसी भी दिष्टिकोण से सही नहीं है. मेरे कुछ दोस्त मेरे इन बातों से इत्तेफाक नहीं रखते होंगे पर मैं ये दावे के साथ कहता हूँ कि अगर सारे मीडिया वाले सच में दिल से मेरी बातों पर अमल करेंगे तो मेरी इन
बातों को नकारेंगें नहीं .
                                                                       गजेन्द्र कुमार

Thursday, 18 April 2013

तो क्या सीबीआई की तरह हीं सरकार के अधीन हो जाएगी न्यायपालिका ???


 जजों (न्यायधिशों) की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव लाने का मन सरकार बना चुकी है और इसके लिए जल्द हीं प्रस्ताव् लाने वाली है. सरकार के इस नए प्रस्ताव् के अनुसार जजों (न्यायधिशों) की नियुक्ति प्रक्रिया में अब देश के कानून मंत्री के साथ-साथ राष्ट्रपति द्वारा मनोनित दो कानूनविद भी होंगे. जबकि अभी जजों (न्यायधिशों) की नियुक्ति प्रक्रिया में सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम न्यायधिश लोग ही भाग लेते हैं, जो की जजों की नियुक्ति करतें हैं. सरकार के इस नए प्रस्ताव् के आने के बाद न्यायधिशों की नियुक्ति में सरकार का दखल भी होगा. सरकार अपनी मर्ज़ी के अनुसार न्यायधिशों की नियुक्ति करेगा और उसके बाद सीबीआई की तरह न्यायालय (कोर्ट) भी सरकार की कठपुतली बनकर रह जाएगी. सरकार के खिलाफ कोई भी फैसला देना मुश्किल हो जायेगा. सीबीआई की तरह न्यायालय के फैसलों में भी सरकार की दखलअदाज़ी बढ़ जाएगी.

                                        सरकार के इस कदम से तो यही लगता है की सरकार अब न्यायालय को भी अपने नियंत्रण में करना चाहती है ताकि सरकार के खिलाफ आने वाले फैसले पर विराम लग सके. न्याय में भी हेराफेरी करके सरकार अपने दामन पर लगे भ्रषटचारों के दागों को मिटाना चाहती है. अगर सरकार की मंशा नेक होती तो सरकार सबसे पहले सीबीआई को अपने नियंत्रण से मुक्त करती जिससे सीबीआई स्वतन्त्र होकर अपना काम करती. सीबीआई में सरकार की दखलअदाज़ी किसी से छुपी हुई नहीं है. तमिलनाडु की पार्टी (डी.एम. के) का सरकार से समर्थन वापिसी के तुरंत बाद उसी पार्टी की नेता के दफ्तर पर सीबीआई के छापे पड़ना, कोयला घोटाले में सुप्रीम कोर्ट में रिपोर्ट पेश करने से पहले सीबीआई का सरकार से मिलना, ऐसे कई उदाहरण हैं जो सीबीआई पर सरकार के नियंत्रण को साबित करती है. इस कारण सीबीआई अपना काम सही ढंग से नहीं कर पाती. सीबीआई पर से दिनोदिन लोगों का विश्वास उठता जा रहा है. अगर न्यायालय में भी सरकार का दखल होगा तो स्वाभाविक है की न्याय पर उँगलियाँ उठेगी और धीरे धीरे न्यायालय पर से भी लोगों का विश्वास कम हो जायेगा जो की एक लोकतंत्रिक देश के हित में बिलकुल नहीं होगा .
                               
                                                                                                                                        गजेन्द्र कुमार