'आम आदमी पार्टी' अब खास होती जा रही है पर अपने अच्छे कामों की वजह से नहीं बल्कि नित दिन नए-नए विवादों की वजह से। मीडिया के साथ-साथ आम लोग इस पार्टी को घटिया पार्टी और पता नहीं क्या क्या कह रहे हैं। ऐसा भी नहीं की बाकी दूसरी पार्टी बहुत सही है वो भी यही करती है जो 'आम आदमी पार्टी' करती है। बात बस इतनी सी है कि 'आम आदमी पार्टी' आम आदमी के नाम पर इतना आम हो गयी है कि कोई भी कुछ भी कहने में नहीं हिचकता। वही दूसरी ओर शिवसेना और राज ठाकरे की पार्टी कुछ भी करे या कुछ भी कहे तो न लोग कुछ कहते हैं न हैं मीडिया कुछ कहता है, न लिखता है। क्यों की उनसे लोगों को और मीडिया को डर लगता है। 'आम आदमी पार्टी' तो राजनीति में सारी पार्टियों को राजनीति सिखाने आई थी पर अब वही उनसे राजनीती सिखने लगी है और उम्मीद है जल्द हीं वो भी इनसे राजनीती सिख लेगी।
बहकते हुए फिरतें हैं कई लफ्ज़ जो दिल में. दुनिया ने दिया वक़्त तो लिखेंगे किसी रोज़................
Thursday, 8 October 2015
Saturday, 12 September 2015
प्यार देने का नाम है लेने का नहीं !!!
ख़ामोश रहता है वो शख़्स... जिसकी एक आवाज़ से घर में सन्नाटा छा जाता था। जिनका कोई भी फैसला घर वालों के लिए आख़िरी फैसला हुआ करता था। आज उनके फैसले का कोई कदर नहीं। उनके फैसले से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखने वाला घर का सदस्य भी मुस्कुरा कर उनके फैसले का स्वागत किया करता था। उनके फैसलों का नतीजा हीं तो है कि आज इस परिवार का समाज और गॉव में इतना नाम है, इज़्ज़त है। आज वो शख़्स बेबस है, खामोश है, उनकी कोई नहीं सुनता, उनके फैसलों पर अचानक उँगलियाँ उठनी शुरू हो गयी है, लोगों का विश्वास उनपर से उठने लगा है। ये सच हीं कहा गया है कि वक़्त के साथ बहुत कुछ बदल जाता है। बुढ़ापे के दहलीज़ पर आकर ये शख्स ये सोचकर कितना मन हीं मन तड़पता होगा कि जिस परिवार के ख़ातिर मैंने अपनी हज़ारों ख़्वाहिशें दफ़न की उसका नतीज़ा ऐसा हुआ।
सोचता होगा कि इस परिवार को बनाने में अपनी पुरी उम्र लगाई ताकि बुढ़ापे में सुकून और चैन की ज़िंदगी बिताएंगे। इन्होने परिवार रुपी मज़बूत पेड़ इसलिए लगाया था कि बाद में उन्हें छाया देगा पर इन्हें कहां मालूम था की इन पेड़ों को उनकी छाया की आदत पड़ जाएगी। विडंबना ये है कि लोग आज भी इस बूढ़े बरगद के पेड़ को सहारा देने के बजाय इनसे सहारा और छाँव मांगते हैं। कुछ लोग ये भी तोहमत लगाते हैं कि मुझे छाँव कम दिया। उनकी इन बातों पर ये विशाल बूढ़ा बरगद का पेड़ मंद-मंद मुस्कुराता है, ये सोचकर कि मैंने तो अपनी टहनियां फैलाकर हर किसी को बस छाँव देने की कोशिश की, खुद को धुप में जलाकर, बिना किसी स्वार्थ के, कोई ज्यादा छाँव ले गया तो इसमें मेरा क्या कसूर? किसी को ज्यादा छाँव देने से मुझे क्या फायदा? बरगद का पेड़ मायूस होता है आज भी उनकी मांग पर, पर जितना हो सकता है आज भी उनके लिए कर रहा है, आखिर उनसे प्यार जो करता है, पर बरगद को उनके प्यार से भरोसा उठता जा रहा है... दिल को तस्सली देता रहता है इस बात से कि प्यार देने का नाम है लेने का नहीं !!!
गजेन्द्र बिहारी
सोचता होगा कि इस परिवार को बनाने में अपनी पुरी उम्र लगाई ताकि बुढ़ापे में सुकून और चैन की ज़िंदगी बिताएंगे। इन्होने परिवार रुपी मज़बूत पेड़ इसलिए लगाया था कि बाद में उन्हें छाया देगा पर इन्हें कहां मालूम था की इन पेड़ों को उनकी छाया की आदत पड़ जाएगी। विडंबना ये है कि लोग आज भी इस बूढ़े बरगद के पेड़ को सहारा देने के बजाय इनसे सहारा और छाँव मांगते हैं। कुछ लोग ये भी तोहमत लगाते हैं कि मुझे छाँव कम दिया। उनकी इन बातों पर ये विशाल बूढ़ा बरगद का पेड़ मंद-मंद मुस्कुराता है, ये सोचकर कि मैंने तो अपनी टहनियां फैलाकर हर किसी को बस छाँव देने की कोशिश की, खुद को धुप में जलाकर, बिना किसी स्वार्थ के, कोई ज्यादा छाँव ले गया तो इसमें मेरा क्या कसूर? किसी को ज्यादा छाँव देने से मुझे क्या फायदा? बरगद का पेड़ मायूस होता है आज भी उनकी मांग पर, पर जितना हो सकता है आज भी उनके लिए कर रहा है, आखिर उनसे प्यार जो करता है, पर बरगद को उनके प्यार से भरोसा उठता जा रहा है... दिल को तस्सली देता रहता है इस बात से कि प्यार देने का नाम है लेने का नहीं !!!
गजेन्द्र बिहारी
Thursday, 30 July 2015
जैसे वो कोई आतंकी नही मसीहा था ...
याकूब मेमन की फांसी पर देश का एक बड़ा बुद्धिजीवी वर्ग ऐसे हायतौबा मचा रहा है जैसे वो कोई आतंकी नहीं बल्कि कोई मसीहा था। अफ़सोस होता है इनकी बुद्धिमता पर, क्या ऐसा करके ये बुद्धिजीवी वर्ग देश को ये सन्देश देना चाहता है की देश के सर्वोच्च न्यायालय का फैसला भी संदिग्ध होता है? इस पर विश्वास मत करो। ऐसा करके देश में एक अविश्वास का माहौल बनाना चाहते हैं ? याकूब मेमन इतना महत्वपूर्ण कैसे हो गया? देश के सामने इससे ज्यादा महत्वपूर्ण मुद्दा कोई और नहीं है क्या? याकूब क्या इसलिए महत्वपूर्ण हो गया क्यूंकि वो इक मुस्लिम (कहने को अल्पसंख्यक) था, क्या ये बुद्धिजीवी वर्ग ये कहना चाहता है कि अल्पसंख्यकों को भारत में न्याय नहीं मिलता? भारत में अल्पसंख्यकों को लेकर दोहरी नीति है? अगर ऐसा होता आज पूरा देश, पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम के चले जाने पर रो नहीं रहा होता। अगर याकूब भी अच्छा इंसान होता तो देश उसके बारे में ज़रूर सोचती, एक कातिल पर रहम कैसा, फिर तो डेल्ही गैंग रेप के आरोपियों पर भी रहम करनी चाहिए थी। उनके लिए ये बुद्धिजीवी वर्ग क्यों नहीं बोला। क्या इसलिए की वो अल्पसंख्यक नहीं था। ये लोग राजीव गांधी के हत्यारे, भुल्लर आदि का उदाहरण देकर याकूब को बचाना चाहते थे। अगर आपको अपनी बुद्धि पर इतना नाज़ है तो आप ये जानते हुए की याकूब दोषी है का बचाव न करके उन लोगों को सज़ा दिलाने की कोशिश करते जिनको उनके अपराध के अनुसार सज़ा नहीं मिली। इन बुद्धिजीवी वर्ग से मेरा विनम्र निवेदन हैं कि याकूब का मुद्दा छोड़ के देश में गरीबी, भुखमरी और बेरोज़गारी से हर दिन मर रहे लोग या मर-मर के जी रहे लोगों का मुद्दा उठाये और उनका अपना हक़ दिलवाए। अगर वो ऐसा कर सके तो उनका देशपर बड़ा एहसान होगा।
गजेन्द्र कुमार
गजेन्द्र कुमार
Tuesday, 2 June 2015
बस यूँ हीं ...
अब गुमां नहीं होता मुझे अपने रिश्तों पर
ज़िंदगी ने कुछ ऐसी कहानी पेश की है....
लोग खामोश क्यों रहतें हैं
ज़िंदगी ने बखूबी समझा दिया मुझे ...
रिश्तोें में ख़ामोशी का मतलब काफी गहरा होता है
यानि कहने, सुनने और लड़ने के लिए कुछ नहीं रह गया है
मैं मदद मांगने में संकोच नहीं करता,
पर भीख मांगना मेरी फितरत नहीं ...
ज़िंदगी ने कुछ ऐसी कहानी पेश की है....
लोग खामोश क्यों रहतें हैं
ज़िंदगी ने बखूबी समझा दिया मुझे ...
रिश्तोें में ख़ामोशी का मतलब काफी गहरा होता है
यानि कहने, सुनने और लड़ने के लिए कुछ नहीं रह गया है
मैं मदद मांगने में संकोच नहीं करता,
पर भीख मांगना मेरी फितरत नहीं ...
Saturday, 28 March 2015
Friday, 20 March 2015
Thursday, 19 February 2015
'मांझी' बनी बीजेपी...
बिहार में जीतन राम मांझी की डूबती नैया को पार लगाने के लिए लिए बीजेपी मांझी बनी, पर डूबती नैया को डूबने से नहीं बचा पायी। बीजेपी मांझी जी के इस अपमान को पुरे महादलित समाज का अपमान बता रही है। बीजेपी ये भी कह रही है की वो महादलितों के साथ है, क्या महादलित समाज मांझी जी की डूबती नैया पार न लगाने के बाद भी बीजेपी पर भरोसा कर पायेगी ? या फिर महादलित समाज बीजेपी के साथ को इक राजनितिक पैतरा समझेगी ? ये बड़ा सवाल है...
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